कुदरत का मौन कृत्य

हमारे अगर आचरण मे समता की सौरभ है,तो वह निश्चित रूप से दूर तक जायेगी । वह इसके विपरीत स्वार्थ युक्त धूल-धुएं के गुबार की हवा आदि वातावरण को ओर भी दूषित बनायेगी।

हम या कोई भी सही से उसी बात का अनुसरण करते है,जो घटना हमारे अन्तस मन को प्रभावित करती है क्योंकि कोरे आदर्श और महानता की सारी शिक्षा तो ऊपर से ऊपर निकल जायेगी ।

हम में से बहुत कम लोग यह जानते हैं कि हमारे आसपास की चीजें, हमारा पार्शव वातावरण आदि अपनी खास तरंगे छोड़ते हैं। वह बहुत ही सूक्ष्म तरीके से हमारा ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। यह तथ्य है, कुदरत का कृत्य है।

हमारे दिल से निकलने वाली वह हंसी, जो आंखों से झांककर होठों से निकलती थी, अब सुनाई नहीं देती है क्योंकि उसने शायद अपना रास्ता बदल लिया है । आधुनिक जीवनशैली के परिणाम स्वरूप आज हमारा भोजन और हमारा जीवन दोनों एक समान हो गए हैं।

हम जीवन जीने के लिए नहीं जी रहे, बल्कि सुख सुविधाएं और स्टेटस हासिल करने के लिए जी रहे हैं। हम इस भ्रम में जी रहे है की वेल्थ इज द सोर्स आफ हैपीनेस, द मोर यू हैव, द हैपीयर यू आर अर्थात खुशी का स्रोत धन है लेकिन सुख आलीशान बंगलों महंगी कारों ब्रांडेड कपड़ों में नहीं दरअसल वो हमारे भीतर ही है ।

यहाँ सही से इस बात को समझने की है कि जहां इच्छाओं और अपेक्षाओं का अंत हो जाता है, सुख वहां से शुरू हो जाएगा हम भले ही प्रत्यक्ष रूप में इसे महसूस नहीं कर पाते हैं पर यह तथ्य है कुदरत का मौन कृत्य है।

अतः हमारे द्वारा इसे सदा ध्यान में रखा जाए तो जीवन और गुणवत्ता से जीया जाएगा । यही हमारे लिए काम्य है ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

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