प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने कार्यक्रम “मन की बात” में कहा, “हमें अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए सतत विकास की दिशा में काम करना चाहिए, और इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम टेक्सटाइल वेस्ट की समस्या को गंभीरता से लें।” यह वक्तव्य आज के समय में बेहद प्रासंगिक बन गया है क्योंकि दुनिया भर में बढ़ती जनसंख्या के साथ ही अरबों-खरबों मात्रा में टेक्सटाइल वेस्ट का उत्पादन हो रहा है, जिसमें सबसे ज्यादा चिंता का विषय है टेक्सटाइल वेस्ट, जो बदलते समाज, आधुनिकीकरण और नए जीवनशैली के चलते उत्पन्न हो रहा है।
भारत में ही हर साल लगभग 7,793 किलो टन वस्त्र कचरे का उत्पादन होता है, जो वैश्विक वस्त्र कचरे के उत्पादन का लगभग 8.5% है, जिससे भारत को दुनिया में वस्त्र कचरे के उत्पादन में चौथे स्थान पर रखा जाता है, इसके पीछे चीन, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश हैं।
एक अध्ययन के अनुसार टेक्सटाइल वेस्ट भारत के गैर-कृषि मीथेन उत्सर्जन में 5% तक योगदान कर सकता है, और इसी जर्नल में एक अन्य अध्ययन ने बताया कि टेक्सटाइल वेस्ट भारतीय वस्त्र उद्योग के कार्बन उत्सर्जन का 20% जिम्मेदार है, जो दर्शाता है कि एक ही देश के उत्सर्जन से कितना बड़ा पर्यावरणीय प्रभाव पड़ता है।
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया का प्रभाव हमारे जीवन के हर पहलू पर पड़ा है, जिससे हम सब एक दिखावटी जीवन जी रहे हैं, जहां ट्रेंड और फैशन के पीछे भागना सामान्य हो गया है, और लोग अपने कपड़ों को सिर्फ एक बार पहनते हैं क्योंकि एक बार फोटो पोस्ट करने के बाद उन्हें दोबारा पहनना नहीं चाहते, जिससे न केवल कपड़ों की बर्बादी होती है बल्कि टेक्सटाइल वेस्ट की समस्या और बढ़ जाती है।
इस गंभीर मुद्दे को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम “मन की बात” में भी इस पर चर्चा की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या कितनी गंभीर है। टेक्सटाइल वेस्ट की बढ़ती समस्या को देखते हुए कई उद्योग और संगठन सामने आए हैं जो इस कचरे को इकट्ठा कर उपयोगी वस्तुओं में बदलने का काम कर रहे हैं, जिनमें सबसे आगे हरियाणा का पानीपत शहर है, जो वस्त्र उद्योग के लिए मशहूर है और अब इस कचरे को रीसाइकल के माध्यम से नए उत्पाद बनाने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है; पानीपत के उद्योगपति पुराने कपड़ों को इकट्ठा करके उन्हें साफ-सुथरा बनाते हैं और उन्हें रजाई, कालीन, फर्नीचर कवर और अन्य घरेलू सामानों में बदलते हैं, जिससे न केवल कचरे की मात्रा कम होती है बल्कि रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं।
यह साबित करता है कि यदि हम अपने पुराने कपड़ों को सही तरीके से रीसाइकल करें तो यह पर्यावरण के लिए एक बड़ा योगदान हो सकता है। इसके अलावा कई एनजीओ और स्वयंसेवक भी इस कार्य में दिन-रात लगे हुए हैं, वे पुराने कपड़ों को इकट्ठा करते हैं, उन्हें साफ करते हैं और जरूरतमंद लोगों को वितरित करते हैं।
कुछ संगठन तो इन कपड़ों से खिलौने, पायदान, बैग और अन्य उपयोगी वस्तुएं भी बनाते हैं, जिससे न केवल पर्यावरण प्रदूषण कम होता है बल्कि गरीब और जरूरतमंद लोगों को भी सहायता मिलती है। इस समस्या का समाधान केवल सरकार या कुछ विशेष उद्योगों तक ही सीमित नहीं है; हमें भी इस दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है।
सबसे पहले हमें अपने कपड़ों के प्रति सोच को बदलना होगा और फास्ट फैशन के बजाय सस्टेनेबल फैशन को अपनाना चाहिए, यानी कपड़ों को ज्यादा समय तक इस्तेमाल करना चाहिए और अनावश्यक खरीदारी से बचना चाहिए।साथ ही जब हमारे कपड़े पुराने हो जाएं तो उन्हें फेंकने के बजाय दान करें या पुनःप्रयोग के लिए दें।
इस प्रक्रिया में हम न केवल टेक्सटाइल वेस्ट की समस्या को कम कर सकते हैं बल्कि समाज के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। जब हम फैशन में सस्टेनेबिलिटी की बात करते हैं, तो यह जरूरी है कि हम वस्त्र वस्तुओं के अत्यधिक उपभोग और उत्पादन की समस्या को इस तरह से हल करें जिससे हमारे पहले से ही दबावग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र पर और अधिक दबाव न पड़े। इसके लिए फास्ट फैशन की मांग को कम करना, स्थानीय ब्रांड्स का समर्थन करना, पुनःप्रयोग के लिए कपड़े दान करना, कपड़े किराए पर लेना या सेकंड-हैंड वस्त्र खरीदना जैसे उपाय पर्यावरण के प्रति जागरूक रहने के कुछ बेहतरीन तरीके हैं। टेक्सटाइल वेस्ट की समस्या एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन इसे हल करने में पानीपत जैसे शहरों में उद्योग और एनजीओ का योगदान सराहनीय है।
हालांकि, हमें यह समझने की जरूरत है कि हर व्यक्ति इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि हम सभी मिलकर इस मुद्दे पर ध्यान देंगे तो हम न केवल अपने पर्यावरण को स्वच्छ बना सकते हैं बल्कि एक सतत और हरित भविष्य की ओर भी बढ़ सकते हैं।
गरिमा भाटी “गौरी”
रावल कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन,
फ़रीदाबाद, हरियाणा।
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