यह तो सब जानते ही हैं कि हम सभी प्राणी इस ब्रह्मांड के ही है तथा इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ एक दूसरे से ही जुड़ा हुआ है। जैसे गर्मी सर्दी से,दिन रात से आदि – आदि ।
हमारे बाहरी जीवन में जो हो रहा है वो हमारे भीतरी जीवन से जुड़ा हुआ है इसलिए यदि हमें अपना बाहरी जीवन सँवारना है, निखारना है , तो उसके लिए हमको भीतरी जीवन सँवारना होगा।
हमारे सकारात्मक चिंतन से, विधेयात्मक भावों से हर परिस्थिति में सम रहकर प्रसन्नता रूपी बसन्त जीवन मे सदैव हो सकता है।हम देखते है कि बाहरी ऋतुएं तो साल में एक ऋतु एक बार आती है लेकिन भीतरी ऋतु तो हर पल हमारे विचारों के साथ मन मे प्रवेश करती है ।
यह सिर्फ बसन्त ही बसन्त हमारे शुध्द मनोयोग पूर्वक भावकिर्या से सम्भव है जिसके सदुपयोग से हमारा जीवन बसन्त की तरह हरपल अप्रमत्त रहकर प्रसन्नता से खिल उठता है।
हमारी इस जीवन यात्रा में तमाम उत्तार-चढ़ाव के बावजूद भी, हमें यह विदित रहें कि एक न एक दिन तो इस संसार से हमको विदा होना ही है, अतः हम इस दुर्लभतम मनुष्य जीवन का पूरा सार निकालते हुए, इस भव को सार्थक करते हुए, अपनी आत्मा को उज्ज्वल करते हुए, अपने परम् धाम की और अग्रसर हो यानि अगर हम भीतर से प्रसन्न हैं तो बाहर भी प्रसन्न ही होंगे।
ऐसे ही विपरीत स्थितियों की बात है। अतः हम अपना ज्यादा ध्यान अपने भीतरी जीवन पर लगाएँ बाहर खुद ही निखर जाएंगे।
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)
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