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मदद

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कहते है कि भगवान ने हमको दो हाथ दिए हैं तो हमको खुलकर दोनों हाथों से किसी की मदद करनी चाहिये । अगर भगवान ने हमको सक्षम बनाया हैं तो हमको किसी की भी मदद करने के लिये पीछे नहीं होना चाहिये । मदद करने से पर के साथ स्व का भी भला होता है ।

वह सही दृष्टि में देना हमारे मस्तिष्क के लिए भी अच्छा हैं । क्योंकि इससे जो मन को परम खुशी और संतुष्टि जो मिलती है वह किसी औषधि और थेरेपी से भी नहीं मिलती हैं ।बिना अहं, बिना स्वार्थ, आत्मिक आनंद से एकदम पर्मार्थ देना है जो मानसिक और हार्दिक संतोष की बात हैं ।

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अगर हम रुपये-पैसे से कितने भी संपन्न हो, अगर हम किसी अपाहिज, जरूरत मंद,दिव्यांग आदि की मदद न कर सके तो हमारी होकर भी संपन्नता किस काम की अतः हम मानवता का धर्म निभाकर किसी भी असहाय के दुःख दर्द में बिना हिचकिचाहट सहयोग करने की कोशिश करें जिससे हम अपनी अच्छाई के गुणों को अखंड रख सकें।

उदारता और कृतज्ञता का भाव आयुवृद्धि के साथ – साथ सम्पूर्ण स्वास्थ पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है । वैसे कर्म सिद्धांत तो यही कहता है कि कर भला तो हो भला।

तो फिर कोई क्यों पीछे रहे भला । इन्सानियत की यह पुकार हैं कि किसी की मदद करने में कभी भी स्वार्थ का भाव नहीं रखना चाहिए ।

हम सेवाकार्य में तो जरूरतमंद के सारथी बनें न कि स्वार्थी।हमें यह बात गांठ बाँध लेनी चाहिए कि उम्र भर कमाया धन भी मन प्रसन्न नहीं रख सकता है जबकि पर निःस्वार्थ सेवा से मिली बिन माँगी दुआएँ सदैव आनंद धन बरसाती हैं।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

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