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डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद गांव की दशा बदलने के लिए 24 साल की उम्र में बनी गांव की सरपंच

डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद गांव की दशा बदलने के लिए 24 साल की उम्र में बनी गांव की सरपंच
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कहा जाता है कि यदि मां पढ़ी लिखी है तो परिवार पढ़ा लिखा होगा। इसी संदर्भ में विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी शासक नेपोलियन बोनापार्ट ने भी कभी कहना था कि यदि मां शिक्षित नहीं है तो उस राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं है क्योंकि एक स्त्री परिवार में तीन रूप में अपनी भूमिका निभाती है।

आरंभ में वह किसी न किसी की पुत्री होती है, उसके बाद वह किसी की पत्नी बनती है और उसके बाद वह किसी की मां बनती है। इन तीनों ही भूमिकाओं में नारी को शिक्षित होना बेहद जरूरी है। तभी वह अपने कर्तव्यों का भली-भांति निर्वाहन कर सकती है।

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आज के दौर में देखा जाए तो महिलाएं घर से बाहर निकल कर जीवन के लगभग हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अपनी सहभागिता दर्ज कर रही हैं।

भारत में ही इसके कई उदाहरण देखे जा सकते हैं। महाश्वेता देवी ने साहित्य के क्षेत्र में उत्थान किया है तो कल्पना चावला ने अंतरिक्ष में पहुंचकर भारत की लड़कियों का प्रतिनिधित्व किया है।

समाज कल्याण के क्षेत्र में मदर टेरेसा से ने अपनी सेवाएं दी है तो ही राजनीति के क्षेत्र में प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी पहचान बनाई।

इसी दिशा में राजस्थान के भरतपुर जिले के छोटे से गांव कामा में मेवात क्षेत्र में 24 वर्षीय युवती शहनाज खान ने भी एक कीर्तिमान रचा है। वह 5 मार्च को सरपंच पद के उपचुनाव में चुनाव लडी और जीत दर्ज की है।

बता दें कि शहनाज एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है और गुरुग्राम के सिविल अस्पताल में उन्होंने अपनी इंटर्नशिप की भी शुरुआत की है। शहनाज की पूरी परवरिश शहर में ही हुई है।

उनका गांव से बहुत कम ही वास्ता अपनी जिंदगी में पड़ा था। वह सिर्फ छुट्टियों में अपने गांव जाया करती थी। लेकिन अब गांव की दशा और दिशा को पूरी तरह से बदलने की जिम्मेदारी शहनाज की होगी।

बता दें कि राजस्थान का मेवात क्षेत्र अपराधिक गतिविधियों के लिए बहुत बदनाम है। यहाँ पर लड़कियों को स्कूल पढ़ने के लिए नही जाने दिया जाता है।

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वही इस क्षेत्र में एक बेहद पढ़ी-लिखी एमबीबीएस लड़की सरपंच पद का चुनाव जीतकर समाज सेवा और पिछड़े लोगों के विकास के लिए राजनीति में कदम रख लिया है।

शहनाज अपनी पढ़ाई को जारी रखते हुए सरपंच पद का निर्वहन करना चाहती है। वे सरपंच बन कर लड़कियों के लिए चलाए जा रहे अभियान बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और शिक्षा अभियान को गांव के हर घर तक पहुंचना चाहती है।

शहनाज का कहना है कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक के क्षेत्र मे बहुत पिछड़ा हुआ माना जाता है और इसी पिछड़े को वह दूर करने की कोशिश करेंगी।

उनकी कोशिश रहेगी कि सड़क, बिजली, पानी जैसी जरूरी बुनियादी सेवाओं को उपलब्ध करवाने के साथ स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधा के क्षेत्र में कार्य किया जाये। शहनाज बताती हैं कि राजनीति में आने का फैसला उन्होंने अपने दादाजी से प्रेरित होकर लिया।

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उनके दादाजी इसी गांव के सरपंच सालो से रहे है। लेकिन साल 2017 में कुछ कारणों के चलते कोर्ट द्वारा उनके निर्वाचन को खारिज कर दिया गया।

फिर सब लोगों के बीच यह सवाल था कि अब गांव में किसे चुनाव लड़ाया जाये तब इसी बीच उनका नाम सामने आया था। बता दें कि आज भी प्रगतिशील समय में भी समाज के कुछ वर्गों में लड़कियों को नजरअंदाज किया जाता है।

ऐसे में एक रूढ़िवादी क्षेत्र में शहनाज खान का उच्च शिक्षा प्राप्त करना और सरपंच के रूप में चुना जाना एक मील का पत्थर है। वह सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन और नारी शिक्षा तथा सशक्तिकरण का एक बेहतरीन उदाहरण बन कर उभरी है।

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