ऐसी की ऐसी धरना चाहूँ चदरिया

ऐसी की ऐसी धरना चाहूँ चदरिया

हर मानव का सपना होता है कि शान्त चित्त दिनचर्या रखूँ और जीवन प्रसन्न मन से जिऊँ क्योंकि जन्म होता है तो वो घड़ी निश्चित सबको पता है लेकिन जाने की घड़ी किसी को मालूम नहीं होती है व कब आँखें मूँद जाये कोई सही से पहले नहीं बता सकता है ।

वर्तमान पल के निकल जाने पर वह अतीत का क्षण बन जाता है, और अभी के बाद का जो क्षण हमारी पहुंच से बाहर है भविष्य की कल्पना करना निरर्थक है अगले पल क्या होगा पता नहीं।

अतीत में जो घटनाएं घटित हो चुकी हैं उसे हम नहीं बदल सकते हैं पर वर्तमान में हमारे पास अपने विचारों, शब्दों और कार्यों आदि का चुनाव करने की क्षमता हैं । हमारे पास बहुत सकारात्मक उर्जा और अच्छी तरंगे होती है।

अपने भीतर चारों और इस सकारात्मक उर्जा के निर्माण के लिए वर्तमान का क्षण ही शाश्वत है,जिसमें विराट का दर्शन होता हैऔर यही द्वार हैं जीवन में प्रवेश करने का। यादें ,स्मृतियां अतीत की पुंजी हैं जो अधिकांश मौकों पर अंशात करती है ।

कल्पनाएं भविष्य की पूंजी है । जिनका एक पल का भी पता नही हैं । हो सके जहां तक वर्तमान में रहें । इसी में जीवन की जीत है। हमारा मन जब एक आध्यात्मिक परिधि में बँध जाता है , हाय-तौबा वाली और-और की क्षुधा वहाँ समाप्त हो जाती है , तृप्ति की बयार फिर मन को अथाह सुकून देती है ।

ऐसी सुकून भरी शान्ति और संतुष्टि से भर लें अपना दामन क्यों जायें असंतोष और अशान्ति की राह अकारण ..? आकांक्षाओं का बोझ लेकर कभी उठ न पायेंगे ऊपर , तनावों और इच्छाओं रहित हल्के मन से आगे बढ़ना कभी न होगा दूभर ।

तभी तो हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते है कि जाऊं तो चदरिया ज्यों कि त्यों धर के जाऊँ।आशा है ईश कृपा से यह तमन्ना पूरी कर पाऊँ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )

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