मैं कौन ? : Finding Myself

Finding Myself

मैं कौन ? इस प्रश्न का उतर यह है की मैं एक शुद्ध आत्मा हूँ । मैं कौन हूँ ? जब प्रश्न का उत्तर पाने जाग उठा अन्तशचेतन तो शरीर में होने लगी अजीब सी हलचल । सुप्त आत्मा में हुआ प्रकंपन मैं द्रव्य आत्मा हूँ । संसार में मेरा आसन हैं ।

लेकिन इस प्रश्न का उत्तर नहीं था इतना आसान द्रव्य आत्मा तो है सभी जीवों की आत्मा चाहे वह हो संसार या मोक्ष गमन जैन आगमो में आत्मा के है आठ प्रकार । द्रव्य,योग,उपयोग,ज्ञान,दर्शन,कषाय,चरित्र और वीर्य आत्मा ।

द्रव्य आत्मा के साथ जैसे जैसे मेरे भाव वैसी वैसी मेरी आत्मा विविध भावों के उभरने से मैं बन जाती है । अन्य आत्मा मैं कौन हूँ? इस प्रश्न का उत्तर बदल जाता जैसे बदल जाते है । भाव जब तक राग-द्वेष रूपी तरंगों से तरंगित रहेगा मैं कौन हूँ ?

तब तक उत्तर पाना नहीं है आसान राग द्वेष से मुक्त बन कर ही जब वीतरागता की और होंगे क़दम मैं कौन हूँ? का तभी मिलेगा शाश्वत उत्तर। बहुत जटिल और शाश्वत जैसा लगने वाला प्रश्न मैं कौन हूँ (who am I) ।

प्रायः प्रश्न किया जाता है तुम कौन हो? (who are you) और नाम बताके उत्तर दिया जाता है, मैं( नाम – जो कोई भी।) लेकिन अध्यात्म जगत में हम अंतर्मुखी होकर अपनी प्रेक्षा करें तो हम संसारी जीव आत्मा और तेजस और कार्मण शरीर युक्त है और जब तक संसार मे रहेंगे ।

कोई भी गति प्राप्त हो ये दो शरीर तो आत्मा के साथ रहेंगे ही अंतराल गति में भी। अपेक्षा है हम अपने आपकी प्रेक्षा करे और जितना साधना पथ पर ध्यान देते हुए कर्मों की निर्जरा करते हुए और कर्मों को आने से रोकते हुए अपना स्वाभाविक रूप कर्मविमुक्त होकर प्राप्त करने में संलग्न हो।

अपनी आत्मा की खोज शुरू करना पहला कदम होगा । एक -एक सीढी चढ़ते हुए हम पूर्ण खोज पहुंच पाएंगे,हमारा ज्ञानावरण क्षीण होगा तो हम केवलज्ञान के आलोक में अपने शुद्ध स्वरूप के दर्शन कर पाएंगे और मैं कौन हूँ का उत्तर स्वतः मिल जायेगा।सत्य किसी दूसरे खोजने की वस्तु नहीं हरसमय नया सत्य उद्घाटित होता है ।

सत्य एक नहीं जो कुछ पाया जाता है ।वह सत्य का एक अंश है पूर्ण सत्य नहीं हैं ।वो सबघातीकर्मों को खपाकर जीव स्वयं पा सकता है ।अर्हन्त भगवान भी हमें मार्ग बता सकते हैं ।उस मार्ग पर चलना हर जीव को स्वयं पड़ता है ।

तभी तो भगवान महावीर ने बहुत सुंदर और स्पष्ट शब्दों में कहा है की मैं मार्ग दर्शक हो सकता हूँ ,मोक्षदाता नहीं,अपने कर्मों को खपाना स्वयं पड़ता है ।क्योंकि कर्म हर जीव ने अपने से बांधे हैं,वो कर्म-बांधने में स्वतंत्र है,लेकिन भोगने में नहीं, अपना किया हुआ एक भी कर्म कोई दूसरा जीव नहीं भोग सकता,स्वयं को ही भोगना होगा, हम विवेक रखें और कर्मबंध से बचने का प्रयास करें।

“नो हिणे नो अइरीत्ते” है यह आगम वाणी। सफलता पर हम न फुलें।न किसी भी तरह अहंकार के भाव लाएं। असफलता पर हीन भाव से कभी ग्रसित न बन जाएं। समत्त्व भाव विकसायें ।

सफलता तब ही सफल कहलाती जब वह विनम्रता बढ़ाती। कुछ हासिल किया और अहंकार न आये बहुत बड़ा आश्चर्य कहलाये। अगली बार वह फिसलता चला जाये। दिया भाग्य ने साथ तो शायद एकाध बार और सफलता पा जाए। पर निरंतरता नहीं रह पाए।अहंकार है ढंका हुआ कुंआ पता न चलता ,कब लुढ़क जाएं। विनम्र सरल व्यक्ति ही दिन प्रति दिन सफलता पाए।

आगे बढ़ता जाए।हम अपना लक्ष्य हासिल कर पाए। अहम के समुद्र में व्यक्तित्त्व समा गया था स्वयं का। उस झूठी शान को ही मान रहा था परिचय अपना। ऐसे में ‘मैं कौन हूँ ‘ कैसे जान सकता भला।

अब भी उठ जाए ये आवरण चक्षु और अंतर से।खुल जाए ये पट अंतर्मन के हट बाह्य जगत की चकाचौंध से। तब ही हो पायेगा साक्षात्कार स्वयं का स्वयं से । तब ही मैं मिल पाऊंगा अपनी आत्मा के हर स्वर से। रम पाऊंगा आत्मा के निर्झर में अपनी आत्मा के अंतर में।मैं खुश रह पाऊंगा हर पल में ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )

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जैसा चाहो, वैसा सोचो

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