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मिलिए नीलोफर जान से जो अपने घर में मशरूम उगाती है और गजब का मुनाफा कमाती है

Neelofar Jaan mashroom farmer ki kahani
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आज हम बात करने जा रहे हैं दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले की रहने वाली नीलोफर जान के बारे में जो अपने परिवार के लिए जीविका कमाने के मकसद से अपने घर पर जैविक रूप से मशरूम उगा रही ही है ।

नीलोफर जान मूल रूप से दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले की रहने वाली है और कुछ वर्ष पहले ही उन्होंने कश्मीर से मशरूम की खेती की संपूर्ण जानकारियां एवं प्रतिक्षण ली थी , और आज इन्होंने खुद का एक बिजनेस खोल लिया है।

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निलोफर कहती है कि शुरुआत के दिनों में जब जीविका के लिए कुछ करने का सोचा तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था बाद में पता चला कि हम अपना हाथ कृषि में अजमा सकते हैं परंतु हमारे पास इतनी अधिक जमीन नहीं थी इसी कारणवश लोगों ने कहा कि मशरूम की खेती का प्रशिक्षण ले लेना चाहिए इस दौरान मैंने कश्मीर से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया।

नीलोफर बताती है कि कि मैंने प्रशिक्षण लेने के बाद मशरूम का बिजनेस घर पर खोलने की शुरुआत की और इसके बाद सरकार द्वारा भी मदद मिली कृषि विभाग ने मुझे घर पर मशरूम यूनिट स्थापित करने के लिए सब्सिडी प्राप्त कराई इतना ही नहीं मुझे प्रशिक्षण भी दिया और कृषि विभाग में मेरी यूनिट को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास और समर्थन दिखाया ।

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पुलवामा शहर से लगभग 3 किलोमीटर दूर है गंगू गांव उसमें अपने घर पर मुस्कुराती हुई नीलोफर बताती है कि जो लड़कियां नौकरी की तलाश में है और आगे बढ़कर कुछ करना चाहती है उन्हें अपना खुद का एक व्यवसाय शुरू कर लेना चाहिए वह बताती है कि मसरूम की खेती कम जगह अर्थात घर पर आसानी से की जा सकती है और कश्मीर में मशरूम का बाजार काफी अधिक है।

नीलोफर कहती है कि घर पर मशरूम की खेती शुरू करने में कृषि विभाग ने काफी मदद की उन्होंने सब्सिडी के तौर पर 50 हजार बैग दिए और इसके साथ ही साथ मैंने शुरूआत में मशरूम की खेती एक कमरे में करनी शुरू की थी नीलोफर अपना दावा करती है कि उन्होंने शुरुआत में ही स्थानीय मार्केट में उच्चतम कोटि के मशरूम की प्रजातियों को सबसे अधिक कटाई की है मशरूम की इस प्रजाति का नाम हेडर है ।

निलोफर कहती है कि शुरुआत में ही पहली कृषि में खेती काफी अच्छी हुई और बाजार भी काफी बेहतर हुआ क्योंकि कश्मीर में मजदूरों की मांग काफी अधिक है वह कहती है कि पहली खेती में सफलता मिलने के बाद उन्होंने कृषि विभाग से और अधिक बैगों के लिए संपर्क किया ।

अपने बिजनेस के अलावा नीलोफर अपनी पढ़ाई को भी जारी रखती है और इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी से सामाजिक कार्य में परास्नातक भी कर रही है, बातचीत के दौरान निलोफर कहती हैं कि मैं ना केवल अपने परिवार के लिए जीविका कमाती हूं इसके साथ ही साथ में अपनी कमाई का कुछ हिस्सा अपने पढ़ाई के लिए भी खर्च करती हूं नीलोफर कहती है कि उनका लक्ष्य एक शिक्षित व्यवसाय बनाना है ।

निलोफर कहती है कि एक समय ऐसा था कि घर की जीविका भी अच्छे से नहीं हो पाती थी और मैं अपने कॉलेज की सेमेस्टर फी देने के लिए भी असमर्थ थी परंतु आज मैं इस व्यवसाय के द्वारा एक अच्छा जीवन यापन कर रही हूं और घर को भी अच्छी जीविका प्राप्त हो रही है और पढ़ाई का भी खर्च आसानी से निकल जाता है ।

इस सवाल का जवाब देते हुए कि आखिर में मशरूम की खेती कैसे करती है नीलोफर कहती है कि मशरूम की खेती घर में आसानी से की जा सकती है हम मशरूम के बीज को देते हैं और कुछ सप्ताह बाद ही फसल तैयार हो जाती है बीच में फसल का थोड़ा बहुत ध्यान रखना पड़ता
है परंतु फसल होने के बाद उसे अच्छी पैकेजिंग में छोटे बक्से में रखा जाता है ।

इसके बाद इन्हें स्थानीय बाजारों अर्थात महलों में भेजा जाता है स्थानीय बाजारों में ऑर्गेनिक पेक्ड मशरूम 20 से 50 रुपए के बिकते हैं। वहीं इसके विपरीत बड़े मॉल्स में इसकी कीमत 100 से 150 होती है ।

जानकारी के लिए आप सभी को बता दें कि कश्मीर में मशरूम का मार्केट काफी अधिक है क्योंकि लोगों द्वारा काफी अधिक पसंद किया जाता है और मशरूम क्योंकि पसंदीदा सब्जी बन गई है और इसके साथ ही साथ पिछले कुछ दिनों में मशरूम याखमी दही के साथ मिलाकर पकाई गई मसालेदार स्वादिष्ट कढ़ी बहु व्यंजन वाजवान में पेश किया जाता है ।

आगे निलोफर कहती है कि सपने में कभी सोचा नहीं था कि वह मशरूम की खेती करेंगे और इतना अधिक मुनाफा कमा लेंगे वह कहती है या अभी भी मेरे लिए एक सपने की तरह है मैं मशरूम की खेती कर रही हूं और काफी अधिक मुनाफा कमा रही हूं।

नीलोफर कहती है कि आने वाले समय में मैं अपनी एक यूनिट से कई यूनिट में विस्तार करना चाहती हूं , निलोफर बताती है कि मशरूम की खेती ने उन्हें काफी अधिक प्रोत्साहित किया है ताकि वह इस काम को आगे बढ़ा सके और वह कहते हैं कि इस प्रकार की खेती है कि इसमें अगर शिक्षा प्राप्त की जाए तो अन्य किसान भी मशरूम की खेती करके आसानी से एक किसान उधम बन सकते हैं।

इसके साथ ही साथ नीलोफर आगे कहती हैं कि कश्मीर में तालाबंदी राजनीति और कोविड-19 महामारी ने घर में उगाए गए मशरूम को बेचने में किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं किया ।

इतना ही नहीं लॉकडाउन में मशरूम की खेती से और भी अधिक जुड़ने के लिए मेरी सहायता की है और इतना ही नहीं लॉकडाउन की वजह से मैं घर पर रहकर अपना सारा समय अपनी मशरूम की खेती को समर्पित कर आई हूं, निलोफर बताती है कि वह गुणवत्ता वाली फसल को उगाने के लिए अपनी फसल को घंटों समय देती है ।

इस वर्ष नीलोफर ने मशरूम की खेती करके काफी अधिक लाभ कमाया है नीलोफर का कहना है कि महिलाओं को ज्यादातर वित्तीय रूप से स्वतंत्रता नहीं मिलती है और आज मैंने अपने व्यवसाय के द्वारा खुद वित्त स्वतंत्रता हासिल की है, जानकारी के लिए आप सभी को बता दें कि कश्मीर केंद्र प्रशासित राज्य मैं आज महिलाओं के कार्य भागीदारी दर 50% बढ़ गई है ।

 

लेखिका : अमरजीत कौर

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