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प्रोसेसिंग व्यवसाय से 650 आदिवासी महिलाओं में मिला रोजगार

इस 12 वीं पास युवक के प्रोसेसिंग व्यवसाय से 650 आदिवासी महिलाओं को मिला रोजगार

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इस 12 वीं पास युवक के प्रोसेसिंग व्यवसाय से 650 आदिवासी महिलाओं को मिला रोजगार । आज की हमारी कहानी एक ऐसे शख्स की है जो 12 वीं तक की शिक्षा लेने के बाद रोजगार की तलाश में जुट गया था।

रोजगार की तलाश में यह युवक मुंबई समेत कई अलग-अलग जगहों पर घूमा और रोजगार जमाने की कोशिश भी करता रहा।लेकिन कभी वह असफल हुआ तो कहीं उसे सफलता मिली।

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इस तरह 15-16 साल के बाद उसे काफी कुछ तजुर्बा हो गया और उसके बाद उसने कुछ ऐसा किया जिससे उसे गांव में ही अपने साथ-साथ दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए भी एक बेहतर रोजगार मिल गया।

राजस्थान के पाली जिले के रहने वाले राकेश ओझा ने 12वीं तक की पढ़ाई करने के बाद रोजगार के लिए मुंबई चले गए। 15-16 साल के बाद मुंबई से वापस लौट कर जोवाकी एग्रोफूड नाम की एक सोशल एंटरप्राइज आज चला रहे हैं, जिसमें उनको तो रोजगार मिला ही है साथ ही उदयपुर के गोगुंदा और कोटरा उपखंड के अंतर्गत आने वाले आदिवासी समुदाय की महिलाओं को भी रोजगार मिल गया है।

राजेश ओझा बताते हैं कि लगभग डेढ़ दशक तक गांव से बाहर रहकर काम करने के बाद जब वह अपने गांव वापस आए तब उन्होंने देखा कि आदिवासी महिलाओं का कैसे शोषण हो रहा है! ये आदिवासी महिलाएं 10-15 किलोमीटर पैदल चलकर पर फल बेचा करती हैं इसके बावजूद उन्हें अपने फल के पूरे दाम नही मिल पाते हैं।

 राजस्थान के पाली जिले में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं और उनके पास रोजगार का प्रमुख साधन जंगलों से मिलने वाले सीताफल और जामुन जैसे फल हैं। महिलाएं इन फलों को इकट्ठा करके सड़क के किनारे बेचा करती हैं  तो वहीं पुरुष दिहाड़ी मजदूरी करके जीवन यापन करते हैं।

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 राजेश ने जब इन महिलाओं की दशा देखी तब उनके मन में आया कि क्यों न इन महिलाओं के हक के लिए कुछ किया जाए जिससे उन्हें उनका हक मिल सके। इसी सिलसिले में उन्होंने उदयपुर के एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा राम अवतार कौशिक से मिलकर इस बारे में बातचीत की।

विचार विमर्श करके उन्हें फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में इन महिलाओं के लिए रोजगार की संभावना का पता चला। राजेश ने इसके बारे में और जानकारी ली और डॉ कौशिक से प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग ली।

इसके बाद उन्होंने पाली जिले की महिलाओं का एक समूह बनाया और उन सभी को इस बात का आश्वासन दिया कि उन्हें उनके सीताफल बाजार भाव से हर दिन खरीद लिए जाएंगे।

साल 2017 में राजेश ने “जोबाकी एग्रो फूड इंडिया” की स्थापना की, जो कि एक कमर्शियल कंपनी के बजाय सोशल एंटरप्राइज है।  इसके अंतर्गत 12 गांव की महिलाएं का एक समूह बनाया गया है और उन्हें कई चरणों में इसके बारे में ट्रेनिंग दी गई है।

राजेश बताते हैं कि ज्यादातर महिलाएं सीताफल को पूरा पकने से पहले ही तोड़ लिया करती थी। इसलिए उन्हें ट्रेनिंग के जरिए बताया गया कि सीताफल को कब तोड़ना है, उनकी ग्रेडिंग कैसे करनी है और उन्हें इकट्ठा करके प्रोसेसिंग सेंटर तक पहुंचाना है।

प्रोसेसिंग सेंटर तक पहुंचाने के लिए हर गांव में एक संग्रह केंद्र भी बनाया गया, जहां पर ये आदिवासी महिलाएं सीताफल और जामुन जैसे फलों को इकट्ठा करके ला कर देती हैं। उसके बाद इन फलों को इकट्ठा करके प्रोसेसिंग सेंटर तक पहुंचाया जाता है।

करीब डेढ़ सौ महिलाओं को इनका पल्प बनाने की भी ट्रेनिंग दी गई है। यहां पर सीताफल को हार्डनर में हार्ड करके कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता है और इस काम पर कुछ महिलाओं को रखा गया है। कोल्ड स्टोरेज में रखे गए सीताफल के पल्प को विभिन्न कंपनियों की मांग के अनुसार सप्लाई किया जाता है। सीताफल की सबसे ज्यादा मांग आइसक्रीम इंडस्ट्री को है।

महिलाओं को प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग के लिए आईसीआईसीआई फाउंडेशन ने भी काफी मदद की और फल तोड़ने से लेकर फल के पल्प बनाने तक की ट्रेनिंग आईसीआईसीआई फाउंडेशन के तहत ही दी गई। सीताफल के अलावा जामुन की प्रोसेसिंग पर भी ध्यान दिया गया।

क्योंकि इन इलाकों में जामुन भी खूब पाया जाता है। जामुन के पल्प का जूस बनाने के साथ ही आइसक्रीम बनाने में भी इस्तेमाल होता है। इसके अलावा जामुन की गुठली का पाउडर भी बनाए जाते हैं और जैसा कि सब जानते हैं जामुन डायबिटीज के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद होता है।

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राजेश बताते हैं कि पिछले एक साल के दौरान उन्होंने करीब 90 हजार टन सीताफल और 10 टन जामुन की प्रोसेसिंग की जिससे उनका टर्नओवर करीब 60लाख कर रहा।

वर्तमान समय में 2 गांव में प्रोसेसिंग सेंटर बने हुए हैं और 12 गांव में फलों का संग्रह किया जाता है। इसमें कुल 650 आदिवासी महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है।

राजेश की कंपनी को भारत के सोशल स्टार्टअप प्रोग्राम, रफ्तार में भी जगह मिली है। फिलहाल कंपनी सीताफल, जामुन के अलावा हरे चने और आंवले की प्रोसेसिंग पर भी काम कर रही है।

सीताफल के छिलकों का इस्तेमाल जैविक खेती के लिए खाद बनाने में भी हो रहा है। इस दौरान उन्होंने करीब 500 किसानों को जैविक खेती से भी जोड़ दिया है और कई महिलाओं को औषधि खेती की ट्रेनिंग भी दिला रहे हैं।

राजेश ओझा का कहना है की मेरा उद्देश्य आने वाले समय में फल और सब्जियों को प्रोसेसिंग पर काम करना है साथ ही इन इलाकों में जैविक खेती पर जोर देना है।

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