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Tuesday, January 19, 2021

कभी करना पड़ता था ₹50 की मजदूरी आज है 15 करोड़ का कारोबार आइए जानते हैं इस युवक की कहानी

कभी करना पड़ता था ₹50 की मजदूरी आज है 15 करोड़ का कारोबार आइए जानते हैं इस युवक की कहानी । हर इंसान की जिंदगी मे कठिन दौर आता है लेकिन हर किसी के लिए इसकी व्याख्या अलग होती है।

बहुत सारे लोग कठिन समय में अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए बहाने ढूंढते रहते हैं। वही कुछ लोग असाधारण होते हैं और कठिन समय में भी सफल होने का रास्ता ढूंढ़ लेते हैं और कठिन समय को अपनी सफलता का कारण बना देते हैं।

जीवन को जीने के तरीकों को बेहतर बनाने और नया कौशल सीखने की क्षमता ही सफलता की कुंजी होती है। आज की हमारी यह कहानी है हरियाणा के रहने वाले अरविंद की जिन्होंने बुरा वक्त देखा और उसके बाद भी सफलता का रास्ता बनाने में कामयाब रहे।

अरविंद ने 16 साल की उम्र में ही साल 2011 में दिहाड़ी मजदूरी करना शुरू किया था, जिससे उन्हे प्रतिदिन ₹50 की मजदूरी मिलती थी जो कि उनकी व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करती थी साथ ही समय-समय पर परिवार को भी सहायता मिल जाती थी।

यह अरविंद के जीवन का कठिन दौर था। लेकिन इसके बावजूद अरविंद के पास जो भी था वह उससे खुश थे। हालांकि अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को देखकर वह बेहद परेशान रहते थे और अपने परिवार का भाग्य बदलने की इच्छा रखते थे।

 धीरे-धीरे उन्होंने अलग-अलग तरह की कई छोटी नौकरियाँ की। 20 साल की उम्र तक अरविंद में संगीत के क्षेत्र में कुछ रुचि विकसित हुई और स्थानी संगीतकारों के साथ मिले और उनसे दोस्ती कर ली। दिन भर कड़ी मेहनत करके वह अपने दोस्तों के साथ डीजे पार्टियों के लिए निकल जाया करते थे।

रोहतक में उन दिनों नया नया डीजे का चलन शुरू हुआ था और सभी लोग छोटी बड़ी पार्टियों के लिए डीजे को किराये पर लिया करते थे। अरविंद के लिए यह आकर्षक तो था साथ ही उन्हें संगीत में रुचि थी और इससे उन्हें अपना हुनर विकसित करने में मदद मिली। धीरे धीरे डीजे पार्टियों में अरविंद की मांग बढ़ने लगी और जल्दी डीजे की कला में वह महारत हासिल कर लिये।

लगभग एक दशक तक अरविंद ने रोहतक और आसपास के क्षेत्रों में डीजे का काम किया और एक लोकप्रिय डीजे बने रहे। इस दौरान उन्होंने पैसे कमाये और साथ ही प्रतिष्ठा भी कमाई।

डीजे की दुनिया में कामयाबी हासिल करने के बावजूद अरविंद एक नए व्यवसाय क्षेत्र में जाने के लिए उत्सुक थे और साल 2013 में दिल्ली के रामलीला मैदान में चल रहे कार्यक्रम में ढांचा गिरने से एक दुर्घटना के बारे में उन्हें जानकारी हुई।

इस दुर्घटना ने उन्हें इस तरह के आयोजनों में एक बेहतर एलमुनियम ट्रंस का उपयोग करने की आवश्यकता से रूबरू करवाया। अरविंद को इवेंट मैनेजमेंट इंडस्ट्री के काफी लोग जानते थे और इस क्षेत्र में कारोबार की संभावना को देखते हुए वह दिल्ली में एलमुनियम ट्रंस (Aluminium truss) के एक व्यापारी से मिले।

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अरविंद ने जब एलमुनियम ट्रांस (Aluminium truss) के व्यापारी से बातचीत में एलमुनियम ट्रंस की बेहतर गुणवत्ता के बारे में पूछा तब व्यापारी ने हँसते हुए कहा कि सभी एलमुनियम ट्रंस चीन से आयात होकर आते हैं।

कोई भी भारत की कंपनी इस तरह के ट्रंस नही बनाती है जिस वजह से अरविंद निराश हुए और उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वह भारत में एलुमिनियम ट्रंस बनाएंगे।

फिर अरविंद ने एलमुनियम ट्रंस (Aluminium truss) पर काफी शोध किया और इस शोध के दौरान उन्होंने करीब ₹10 लाख खर्च किये लेकिन साथ ही इससे उन्हें व्यवसाय की बेहतर समझ भी हो गई।

इसके बाद उन्होंने व्यवसाय करने के लिए और एलमुनियम ट्रंस (Aluminium truss) बनाने के लिए एक छोटी विनिर्माण कम्पनी की स्थापना की और पहला ट्रंस 6 महीने के बाद तैयार हुआ।

इसके बाद उन्होंने दिल्ली के उसे व्यापारी को बुलाया जिसने उनके विचार का मजाक उड़ाया था। व्यापारी ने अरविंद को सलाह दी कि वह अपने ट्रंस का प्रदर्शन दिल्ली की एक प्रदर्शनी में करें और फिर अरविंद अपने ट्रंस को लेकर दिल्ली पहुंच गए और प्रदर्शनी में स्टाल लगाया।

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अरविंद की मेहनत कामयाब हुई और उनके उत्पाद के लिए अच्छी प्रतिक्रिया और सराहना लोगों से मिली। आज अरविंद की कंपनी ‘डेविल ट्रंस ‘ देश मे छोटे बड़े कार्यक्रमों के लिए ट्रंस की आपूर्ति से लेकर उसका ढांचा तैयार करने तक का काम करती है।

आज उनके पास भारत के प्रमुख और प्रसिद्ध हस्तियों के इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों के ग्राहक भी आते हैं। राजनीतिक जगत से लेकर कॉर्पोरेट और मनोरंजन जगत तक के कई सारे इवेंट्स में अरविंद के ट्रंस का इस्तेमाल हुआ है। साल 2019 में अरविंद के डेविल ट्रंस को भारत में सर्वश्रेष्ठ ट्रंस कंपनी का पुरस्कार भी मिला।

अरविंद अपनी सफलता के बारे में बताते हुए कहते हैं कि जीवन में दो चीजें महत्वपूर्ण होती है – दृढ़ संकल्प और किसी भी चीज को करने के लिए जुनून। उनका मानना है कि आपके सपने चाहे कितने भी अवास्तविक क्यों न लगते हैं लेकिन अगर पूरी दृढ़ता के साथ लक्ष्य का पीछा करने में कोशिश की जाये तब मंजिल जरूर मिलती है।

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