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Saturday, January 23, 2021

देश की First lady doctor की प्रेरणा भरी कहानी

देश की First lady doctor की प्रेरणा भरी कहानी है ये । भारत में जिस दौर में महिलाओं को शिक्षा मिलना भी दूभर था ऐसे में एक महिला ने विदेश जाकर डॉक्टर की हासिल की और लोगों के लिए एक मिसाल बन गई। इनका व्यक्तित्व हर महिला के लिए Source of Inspiration है और हमेशा रहेगा।

इन्होंने जब डॉक्टर बनने का फैसला लिया तब समाज ने आलोचना की कि एक शादीशुदा हिंदू महिला कैसे विदेश में जाकर पढ़ाई करोगी। लेकिन वह अपने निर्णय पर अडिग रही।

आलोचनाओं की परवाह नही की और उन्हें भारत की First lady doctor होने का गौरव मिला। हम बात कर रहे है Anandi Gopal Joshi की, जिनकी कहानी हर किसी के लिए प्रेरणा स्त्रोत है।

 आनंदी का जन्म 31 मार्च 1865 को पुणे में एक रूढ़िवादी विचारघारा वाले हिंदू ब्राह्मण परिवार के घर में हुआ था और उस जमाने में लोग खुद की जरूरत और इच्छा से पहले समाज क्या सोचता है क्या कहता है, इस बात की परवाह करते थे। Anandibai का बचपन का नाम यमुना था।

बचपन में इन्हें ज्यादा पढ़ाया लिखाया नही गया और कड़ी बंदिशों में रखा गया, मात्र 9 साल की छोटी सी उम्र में अपने से 20 साल बड़े गोपाल विनायक जोशी के साथ इनका विवाह कर दिया गया। विवाह के बाद यमुना का नाम बदलकर Anandibai हो गया।

जब यह मात्र 14 साल की थी तभी इन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन चिकित्सा के अभाव के चलते उनके बेटे का मात्र 10 दिन में ही देहांत हो गया, जिससे उन्हें इतना सदमा लगा कि वो एक तरह से अंदर से टूट सी गई। लेकिन फिर खुद को संभालने के बाद उन्होंने खुद को डॉक्टर बनाने का निश्चय किया और उसी वक्त उन्होंने ठान लिया कि अभाव के चलते होने वाली असमय मौतों को रोकने में वह अपनी पूरी कोशिश करेंगी।

Anandibai के इस फैसले का परिजन द्वारा और समाज में विरोध हुआ, मगर उनके पति गोपाल विनायक जोशी ने उनका साथ दिया। उनके पति गोपाल विनायक Progressive ideology के थे और महिला शिक्षा का समर्थन करते थे। उन्होंने ही आनंदीबाई को अंग्रेजी, संस्कृत और मराठी भाषा सिखाई और पढ़ने के लिए उन्हें डांटा भी करते थे।

उन दिनों भारत में Allopathic doctor की पढ़ाई की व्यवस्था न होने की वजह से उन्होंने विदेश जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करने का फैसला लिया।

इसके बारे में उपन्यासकार जनार्दन जोशी ने अपने उपन्यास आनंदी गोपाल में लिखा है कि “गोपाल की जिद थी कि मै अपनी पत्नी को ज्यादा से ज्यादा पढ़ाऊंगा और पुरातन पंथी ब्राह्मण समाज कार का तिरस्कार भी झेला और सात समंदर पार अपनी पत्नी को भेजकर उन्होंने पहली भारतीय महिला डॉक्टर बनाने का इतिहास रचा”।

Anandi Gopal Joshi
Anandi Gopal Joshi का छोटा सा जीवन आज भी महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत है।

1883 में आनंदीबाई अमेरिका के पेंसिलवेनिया पहुंच गई और वह विदेश की धरती पर कदम रखने वाली पहली हिंदू महिला बनी। 19 साल की उम्र में 1886 में डॉक्टरी की पढ़ाई करके वह भारत लौट आई। तब भारत में ब्रिटिश शासन हुआ करता था और Queen victoria ने पत्र लिखकर उन्हें बधाई दी और भारत में उनका स्वागत किया गया।

लेकिन भारत आने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें टीबी हो गई और मात्र 22 साल की अल्प आयु में उनकी मृत्यु हो गई। भले ही आनंदीबाई जिस उद्देश्य से Doctoral degree हासिल करने विदेश गई थी और डॉक्टरी की डिग्री हासिल की उसमें वह पूरी तरह से इसमें सफल नहीं हो पाई लेकिन समाज में उन्हें वह स्थान मिला जो एक मिसाल बना।

उन्होंने अपने जज्बे और हिम्मत से उस दौर की लड़कियों को अपने सपने पूरा करने और लड़ने की हिम्मत दी। आनंदी गोपाल नाम से बाद में सीरियल बना और इसका प्रसारण दूरदर्शन पर भी किया गया।

इनके सम्मान में ही शुक्र ग्रह पर बने तीन बड़े-बड़े गड्ढों मे (इन गड्ढों का नाम भारत के प्रसिद्ध महिलाओं के नाम पर रखा गया)  जिसमें एक जोशी क्रेटर है, जोकि आनंदी गोपाल जोशी के नाम पर ही रखा गया है।

आनंदी गोपाल जोशी का छोटा सा जीवन आज भी महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। उन्होंने समाज की रूढ़िवादी विचारधारा का विरोध करके नई परंपरा की शुरुआत की उनकी कहानी दृढ़ निश्चय और कड़ी मेहनत का एक सटीक उदाहरण है।

 

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