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पोलियो ग्रस्त होने के बावजूद खेती करके कमाते हैं सालाना एक करोड़ रुपए

पोलियो ग्रस्त होने के बावजूद खेती करके कमाते हैं सालाना एक करोड़ रुपए
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जिंदगी में चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हो अगर इंसान कामयाबी पाना चाहता है तो उसके अंदर दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए। क्योकि दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बड़ी से बड़ी ताकत घुटने दे देती है।

हर इंसान की जिंदगी में बहुत सारी कठिनाइयां आती हैं। अलग-अलग मोड़ पर ये कठिनाइयां रास्ता रोकने का काम करती हैं लेकिन जिन व्यक्तियों का हौसला बुलंद होता है वह हर बाधाओं को पार करते हुए एक हीरो के रूप में उभर कर आते हैं और अपने कामयाबी की दास्तां लिखते हैं।

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भारत ने पद्मश्री सम्मान भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और किसी भी व्यक्ति द्वारा इसे प्राप्त करना अपने आप में बड़ी बात मानी जाती है।

आज की हमारी कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो लोगों की विकलांगता के प्रति धारणा बदल सकते हैं। यह शख्स विकलांग होने के उपाय कोई आरामदायक व्यवसाय नहीं करते जिसमें उन्हें कुर्सी पर बैठकर काम करना पड़े बल्की उन्होंने वह रास्ता चुना है जो कम ही लोग चुनते हैं। उन्होंने परिश्रम की राह चुनी है।

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हम बात कर रहे हैं गेनाभाई दरगाभाई पटेल की, जिन्होंने विकलांगता के बावजूद खेती को अपने बिजनेस के रूप में अपनाया है और यह साबित कर दिया है कि विकलांग होने के बावजूद वह खेती करने में सक्षम है और लोगों के लिए एक मिसाल बन गए हैं।

गेनाभाई एक किसान परिवार से संबंध रखते हैं। उनके पिता और भाई पूरे दिन खेती के काम में लगे रहते थे। लेकिन उन्होंने खेती के काम नही कर पातेथे क्योंकि उनके दोनों पैर पोलियो की वजह से खराब हो गए थे।

इसलिए उनके पिता उन्हें बेहतर जीवन देने के लिए उन्हें शिक्षित करने पर ज्यादा ध्यान दिया और इसके लिए उन्हें घर से 30 किलोमीटर दूर हॉस्टल में पढ़ाई करने के लिए रख दिया। लेकिन उनका परिवार अशिक्षित था। इस वजह से स्कूलों की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें वापस बुला लिया गया।

गेना भाई विकलांग होने की वजह से अपने पिता और भाइयों की मदद नहीं कर पाते थे। लेकिन वह अपने पिता और भाई की मदद करना चाहते थे, इसलिए वह ट्रैक्टर चलाना सीखे और इसमें महारत हासिल कर ली और अपने गांव के सबसे अच्छे ट्रैक्टर ड्राइवर बन गए। इसके बाद वह खेती के लिए परिस्थितियों के हिसाब से फसलों की देखभाल करना शुरू किए।

इस बारे में कहना भाई बताते हैं कि वह खेती करना चाहते थे इसलिए वह फसलों को देखना शुरू किए कि कौन सी फसल की खेती करना उनके लिए अनुकूल रहेगा। वह कोई ऐसी फसल उगाना चाहते थे जिसे एक बार उगाया जाए और लंबे समय तक उससे रिटर्न मिलता रहे।

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उन्होंने कई सारे एग्रीकल्चर ऑफिसर और यूनिवर्सिटी से सलाह ली। उसके बाद उन्होंने अनार की खेती करने का विकल्प चुना। अनार की खेती के बारे में सभी जानकारियां इकट्ठा करने के मकसद से वह गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान का दौरा किया और उन्हें अपनी ज्यादातर सवालों का जवाब महाराष्ट्र में मिल गया।

हालांकि वह अनार की खेती करने से पहले आम की खेती में इन्वेस्ट करना चाहते थे। लेकिन आम की फसल साल में एक बार होती है और कई बार फसल खराब हो जाती है और किसान को पूरे साल इंतजार करना पड़ता है। इसीलिए उन्होंने अनार की खेती को विकल्प के तौर पर चुना।

लेकिन उत्तरी गुजरात के जिस क्षेत्र से ही वह आते हैं वहां पर अनार के फसल एक असामान्य फसल थी। आसपास के लोग उनके निर्णय पर सवाल उठाते थे। लेकिन उनके परिवार ने उनकी मदद की और 2004 से 2007 के बीच उन्होंने करीब 18,000 अनार के पेड़ लगाए।

लेकिन उनकी कहानी यहां से शुरू होती है। उन्हें अपनी अनार की फसल के लिए खरीदार मिलना एक बड़ी बाधा थी।

तब इस बाधा से बाहर निकलने के लिए उन्होंने एक युक्ति लगाई उन्होंने ऐसे खरीददार को अपनी फसल बेचने का निर्णय लिया जो उनके खेतों से सीधे उत्पाद ले जाए क्योंकि इससे फिर उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए जयपुर या दिल्ली नही जाना पड़ता। आप पास के किसान जहां खेती से 25 से 30 हजार कमा लेते थे वही देना भाई 10 लाख रुपए तक कमाते थे।

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लेकिन फिर जल्दी उनके जिले में पानी की समस्या आ गई और खेती करना लोगों के लिए मुश्किल लगने लगा। तब उन्होंने इस समस्या का समाधान ड्रिप सिंचाई को अपनाकर निकाला। इससे फसल में वृद्धि हुई है और पानी की बचत भी हुई।

उनकी उत्कृष्ट आइडिया के लिए कई बार उन्हें राज्य सरकारों से और राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मानित किया जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी प्रशंसा की है।

अपने भाषण में उन्होंने गेना भाई की प्रशंसा करते हुए उन्हें लोगों के लिए एक मिसाल बताया था। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी गेना भाई को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान में से एक पद्मश्री से सम्मानित किया था।

गेना भाई की कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि चाहे वह शारीरिक विकलांगता हो या फिर किसी भी तरह की अन्य दूसरी बाधा, अगर हम खुद को कमजोर मानने के बजाय बुलंद हौसले और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ किसी भी चीज को करने में जुट जाते हैं तब हमें कोई भी चीज डरा नहीं पाती है और सफलता मिलती रहती है।

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