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यह बेटी आज पूरी परिवार को पाल रही है

यह बेटी आज पूरी परिवार को पाल रही है

कम उम्र में खेती करने वाली यह बेटी आज पूरी परिवार को पाल रही है

अक्सर देखा जाता है कि लोग आर्थिक तंगी और संघर्ष से हार मान लेते हैं और सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ देते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी मेहनत के दम पर अपनी किस्मत को बदलने में यकीन रखते हैं।

आज की कहानी है उत्तराखंड की रहने वाली बबीता रावत की, जिन्होंने अपने हौसले और मेहनत के दम पर खुद का एक मुकाम हासिल किया है। बबीता भी अपनी जिंदगी में आर्थिक तंगी और संघर्ष के दौर से गुजरी है, लेकिन वह हार नहीं मानी और आज वह लोगों के लिए एक मिसाल है।

रुद्रप्रयाग के एक गांव में रहने वाले बबिता के पिता सुरेंद्र सिंह रावत पर अपने सात् बच्चो समेत परिवार के 9 लोगों के का पेट करने की जिम्मेदारी थी लेकिन अचानक से 2009 में उनकी तबीयत खराब हो गई जिससे परिवार के सामने आर्थिक तंगी उत्पन्न हो गई। परिवार का गुजारा खेती से हो रहा था।

लेकिन पिता के बीमार हो जाने के बाद घर की आर्थिक परिस्थितियाँ बिगड़ने लगी। लेकिन बबिता ने हार मानने के बजाय 13 साल की उम्र में खेतो में काम कर के अपने परिवार की मदद करने लगी और अपनी मेहनत के दम पर किस्मत बदलने में जुट गई।

वह खेतों में काम करने से ले कर खेतों में हल चलाने का भी काम करने लगी। बबीता खेतों में काम करने के बाद 5 किलोमीटर दूर अपने स्कूल भी पैदल पढ़ने बागी जाया करती थी और साथ में दूध भी बेचती थी। इस तरह बबीता की कोशिशों से परिवार का खर्चा आसानी से चलने लगा।

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धीरे-धीरे बबिता ने खेतों में सब्जियां भी उगाने लगी। पिछले 2 सालों से वह अपने सीमित संसाधनों से मशरूम का उत्पादन भी कर रही है जिससे उसे अच्छी आमदनी होती है।

बबीता ने दिन रात मेहनत करके अपने पिता का इलाज करवाया और खुद की पढ़ाई का भी खर्चा उठाया साथ ही अपने तीन बहनों की शादी भी की। बबीता ने विपरीत परिस्थितियों में स्वरोजगार के जरिए जिस तरीके से परिवार को आर्थिक तंगी से उबारा है वह हर किसी के लिए प्रेरणादायक है।

बबीता ने खुद ही अपने खेतों ने हल चलाया और अपनी बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया। आज वह अपने खेतों में सब्जियाँ उगाने के साथ ही, पशुपालन और मशरूम का उत्पादन भी करती है। आज बबीता को अच्छी-खासी आमदनी और मुनाफा हो रहा है।

एक तरफ जहां दुनिया कोरोना वायरस महामारी के चलते परेशान हैं और लॉकडाउन की वजह से हजारों युवाओं का रोजगार छिन गया है।

वहीं इस लॉकडाउन में भी बबीता ने मटर, भिंडी, शिमला मिर्च, बैंगन, गोभी समेत कई सब्जियों का उत्पादन करके आत्मनिर्भर का मॉडल पेश किया है। वास्तव में देखा जाए तो बबीता ने अपने बुलंद हौसलों के दम पर अपनी किस्मत को बदल कर रख दिया है।

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अभी हाल में ही राज्य सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में विशेष उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं की सूची तैयार की गई जिससे उन्हें राज्य के प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

इसमें विशेष उल्लेखनीय काम करने वाली 21 महिलाओं और 22 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को उनके अच्छे कार्य के लिए पुरस्कृत किया जाना है। इस सूची में बबीता का नाम भी शामिल है।

बबीता के संघर्ष की कहानी उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में हाथ पर हाथ धरे किस्मत के भरोसे बैठे रहते हैं। इस कोरोना वायरस महामारी के दौर में उन लोगों को भी बबीता से प्रेरणा लेनी चाहिए जो बेरोजगार होकर अपने घर वापस लौटे हैं।