घर-घर जाकर टूथ पाउडर बेचने वाले vicco कंपनी की सफलता की कहानी

घर-घर जाकर टूथ पाउडर बेचने वाले vicco कंपनी की सफलता की कहानी

आप सब ने vicco का यह जिंगल “विको टरमरिक, नही कॉस्मेटिक, विको टरमरिक आयुर्वेदिक क्रीम…” जरूर सुना होगा। यह वाक्य जमाने से एक सिंगल गाने की तरह लोगों की जुबान पर रहा है।

जिन लोगों ने टीवी देखा होगा वो लोग यह विज्ञापन जरूर देखे होंगे। आज भी विको के उत्पाद बाजार में देखने को मिलते हैं।

लेकिन vicco की सफलता की कहानी बहुत ही दिलचस्प है। आइए जानते हैं इसके सफलता की कहानी के बारे में।

vicco एक ऐसी कंपनी है जिसके उत्पाद अपने गुणवत्ता की वजह से आज भी बाजार में जगह बनाए हुए हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसका बाजार सिर्फ भारत सीमित नहीं है बल्कि कई बार एक्सपोर्ट के लिए भी यह कंपनी कई अवार्ड जीत चुकी है। यह आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काम कर रही है।

vicco कंपनी 500 करोड़ से भी ज्यादा टर्नओवर वाली कंपनी है। लेकिन इसकी शुरुआत बहुत ही छोटी थी। vicco की शुरुआत एक टूथ पाउडर से हुई थी और आज इसके कई उत्पाद हैं, जिसमें विको वज्रदंती,  विको टरमरिक क्रीम, विको फॉर्म बेस्ड, विको टरमरिक फेस वॉश आदि कई उत्पाद कंपनी बताती है।

Vicco की 1952 में हुई थी शुरुआत :-

विष्णु इंडस्ट्रियल केमिकल कंपनी जिसे vicco  के नाम से जाना जाता है। इसकी शुरुआत 1992 में संजीव के दादाजी केशव पेंढरकर करने की थी।

संजीव जी बताते हैं कि उनके दादाजी की पहले नागपुर में एक राशन की दुकान हुआ करती थी। लेकिन यह दुकान परिवार के पालन पोषण के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसलिए उनके दादाजी कुछ अलग करना चाहते थे और वह अपने परिवार के साथ मुंबई आ गए।

मुंबई में ही उनके सपनों ने आकार लिया और उन्होंने अपने सपनों पर काम करना शुरू किया। वह बताते हैं कि उनके दादाजी एक छोटे से गोदाम से काम करना शुरू किया था।

यहां पर वह शुरुआत में टूथ क्लीनिंग पाउडर बनाया करते थे। यह केमिकल फ्री था और बच्चों तथा बड़े सभी के लिए सुरक्षित था। यह एक ऐसी चीज थी जिसे लोग अपने दैनिक जीवन में इस्तेमाल करते थे। इसलिए इसके चलने की पूरी गारंटी थी।

टूथ पाउडर को उनके दादाजी और उनके बेटे घर घर जाकर मार्केट किया करते थे। क्योंकि उस समय इसके अलावा मार्केटिंग का कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं था।

वह लगभग 18 तरह की जड़ी बूटियों से टूथ पाउडर को बनाया करते थे। धीरे-धीरे वह लोगों के बीच काफी मशहूर हो गए।

तब उनके परिवार ने कंपनी रजिस्टर करा दी। इस तरह से 1952 में पहली बार उनकी कंपनी बनी जो सिर्फ एक टूथ पाउडर बनाती थी।

उनके दादाजी दूरदर्शी सोच रखते थे। उन्होंने टूथ पाउडर के साथ-साथ धीरे-धीरे देखा कि लोग टूथपेस्ट अपना रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने बेटे गजानन को जड़ी बूटी का उपयोग करके टूथपेस्ट बनाने के लिए कहा। क्योंकि उनके पिताजी गजानन ने फार्मेसी में डिग्री हासिल की थी।

लगभग 7 साल की मेहनत के बाद विको वज्रदांती टूथपेस्ट बनाया गया। संजीव बताते हैं कि प्राकृतिक तत्वों से रसायन मुक्त टूथपेस्ट तैयार करने का एक कारण यह भी था कि उस समय ज्यादातर टूथपेस्ट में फ्लोराइड का इस्तेमाल करते थे।

इसे ब्रश करने के दौरान अगर गलती से भी कोई इसे निगल ले तो इसका स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव होता है। विशेषकर के छोटे बच्चे जो पेस्ट का स्वाद मीठा होने की वजह से कई बार ऐसे निकल लेते हैं।

जिसकी वजह से बीमार होने का खतरा अधिक रहता है। लेकिन vicco के टूथपेस्ट में किसी भी तरह का रसायन प्रयोग में नहीं लाया जाता था। यह आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर था। इसलिए धीरे-धीरे लोगों के बीच लोकप्रिय हो गया।

1971 में संजीव के दादाजी केशव का देहांत हो गया। तब उनके बेटे गजानंद ने कंपनी को संभाला। उस समय कंपनी का टर्नओवर मात्र एक लाख का था।

vicco को एक सामान्य कंपनी से एक ब्रांड गजानन ने ही बनाया। उन्होंने vicco के दूसरे उत्पाद विको टरमरिक क्रीम को भी लांच किया। इसमें हल्दी के गुणों के साथ प्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल करके बनाया था।

फिल्मो और टीवी पर वीडियो के द्वारा बिज्ञापन :-

1980 के दशक में कंपनी ने टीवी के जरिए विज्ञापन करना शुरू किया। इसके अलावा हुआ वीडियो कैसेट का भी भरपूर प्रयोग करते थे। उस समय ज्यादातर लोग कैसेट खरीदते थे।

कैसेट में vicco के जिंगल अलग-अलग भाषाओं में लोगों तक पहुंचने लगे थे। यह वीडियो कैसेट विदेश में रहने वाले भारतीय भी लेते थे।

इसलिए धीरे-धीरे विको कंपनी का नाम विदेशों में भी होने लगा और प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए कंपनी ने नागपुर और गोवा में अपनी यूनिट लगाई।

आज कंपनी में बदलते वक्त के साथ कई बदलाव किए गए हैं। बढ़ते कंपटीशन के चलते मार्केटिंग की जा रही है। लेकिन आज भी कंपनी अपने उसूलों पर टिकी हुई है। यही वजह है कि आज भी इसके ग्राहक इसकी गुणवत्ता की वजह से बने हुए हैं।

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