नवम्बर 28, 2022

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forest post ki kahani

डॉक्टरों द्वारा की गई पहल का नतीजा ! आदिवासी हेयर ऑयल से लेकर बना रहे हैं अचार, हो गई है आदिवासियों की आय कई गुना

आज हम बात करने जा रहे हैं डॉ मंजू वासुदेवन और डॉ श्रीजा द्वारा की गई पहल के तहत आज आदिवासी एक अच्छा जीवन जी रहे हैं और उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है।

अक्सर पर्यावरण की चिंता करते हुए कहते हैं कि जंगलों का बचाव करना अधिक महत्वपूर्ण है, परंतु क्या हमने कभी उन लोगों के बारे में सोचा जो शुरू से ही जंगलों में रहते आए हैं और उनका घर जंगल ही है भले ही वर्तमान में दुनिया में कितनी भी तेजी से बदलाव आ जाए परंतु आज भी जंगल में रहने वाले लोगों के लिए उनका घर जंगल ही है।

जंगल रहने वाले लोगों के लिए उनकी आमदनी का जरिया भी जंगल ही है और उनका घर भी जंगल ही है वह ना ही इसे छोड़ कर जाना चाहते हैं और ना ही इसके बिना हम जी पाएंगे। जंगलों में आदिवासी बसते हैं और यह आदिवासी अपनी आर्थिक स्थिति और अपने परिवार को चलाने के लिए फल सब्जियों का निर्यात करते हैं।

केरल के चालकुडी और करुवन्नूर नदी के पास कई सालों से कादर, मलयार और मुथुवर की स्थानीय जनजातियां निवास करती आ रही है और इकोलॉजिस्ट डॉ मंजू वासुदेवन ने इन जनजातियों के पास अपनी जिंदगी को बसा लिया है।

इकोलॉजिस्ट डॉ मंजू वासुदेवन कहती है कि वह इन आदिवासियों के बीच रहकर इनकी सारी परेशानियों को नजदीकी से देखती है और कहती हैं कि वह आज भी कार्यों के लिए जंगल के सभी चीजों का इस्तेमाल करते हैं और पूरी तरह से जंगल पर ही निर्भर है।

और इस दौरान वह कहती है कि जंगल में रहने वाले आदिवासियों को उनकी जीवन यापन और आर्थिक स्थिति के लिए कुछ ऐसा देना होगा जो उनके लिए जंगल से ही हो पर ज्यादा लाभदायक और उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर पाए और इसके लिए डॉ मंजू वासुदेवन केरल में स्थित  एक एनजीओ ‘रिवर रिसर्च सेंटर’ के साथ जुड़ गईं।

डॉ मंजू वासुदेवन निवासियों की परेशानियों को हल करने के लिए और उनकी आर्थिक स्थितियों को मजबूत करने के लिए एनजीओ के साथ तो जुड़ गई परंतु वहां उन्होंने फॉरेस्ट पोस्ट की शुरुआत की। यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जो आदिवासियों के लिए पारंपरिक रूप से उनकी आर्थिक स्थिति को दूर करेगा इस

प्लेटफार्म में आदिवासी शतावरी और क्वीन सागा से शहद, अचार, बांस से टोकरियां बनाते हैं और इन उत्पादों को बाहर बाजारों में लोगों को निर्यात करते हैं। इस प्रकार ना केवल आदिवासियों की आमदनी बढ़ेगी इसके साथ ही साथ उन्हें अपने जीवन में आत्मविश्वास आने की क्षमता भी प्रबल हो पाएगी।

 

शतावरी के अचार से मिला आदिवासियों की परेशानियों को हल करने का आईडिया

 

डॉ मंजू वासुदेवन ने रिवर राइट एक्टिविस्ट, डॉक्टर लता अनंत के साथ मिलकर आदिवासी समुदाय को वनों अधिकारियों के साथ मिलकर सशक्त करने का प्रयास कर रही थी और उस वक्त डॉ मंजू की  नजर शतावरी पर गई, और उन्होंने ध्यान दिया कि इसकी पैदावार जंगलों में सबसे ज्यादा होती है।

और इस प्रकार की डॉक्टर मंजू को जानकारियों से पता चला कि यहां रहने वाले आदिवासी शतावरी का इस्तेमाल करके अचार तैयार करते हैं। इस तरह ही डॉक्टर मंजू को इस में आदिवासियों की आय को दोगुना करने का एक जरिया नजर आया।

इस प्रकार ही डॉ मंजू ने आम आदमी की और राय को जानने के लिए इलाके में होने वाले एक प्रोग्राम में शतावरी के अचार को बिक्री में रखा था। इस दौरान डॉ मंजू कहती है कि मेरा सोचना

सही निकला प्रोग्राम में एक खरीदार को शतावरी का अचार इतना पसंद आया कि उसने वहां मौजूद सारे डिब्बे खरीद लिए और इसके साथ ही साथ शतावरी से बनने वाले अन्य प्रोडक्ट की डिमांड भी की।

और इस प्रकार डॉ मंजू को शतावरी और लोगों की पसंद का अंदाजा काफी आसानी से हो गया था और इसलिए उन्होंने इस अचार को भारत के कई हिस्सों में पहुंचाने के लिए आगे कदम बढ़ाने का फैसला ले लिया था।

इस प्रकार डॉक्टर द्वारा चलाई गई इस मुहिम के तहत आज आदिवासी शतावरी अचार के साथ-साथ अन्य प्रोडक्ट को तैयार करते हैं और कई अन्य प्रोडक्ट्स के साथ तेल शहद को तैयार करके बाहरी बाजारों में इसकी बिक्री करते हैं।

 

इस प्रकार हुई थी फॉरेस्ट पोस्ट ( Forest Post ) की शुरुआत

 

डॉ मंजू तो यह समझ गई थी कि उन्हें करना क्या है परंतु किस प्रकार से करना है यह दुविधा उनके मन को काफी परेशान कर रही थी। डॉ मंजू कहती है कि मैंने शुरू से ही बिजनेस एवं सहकारी मॉडल पर कार्य किया है, और मैं महिलाओं को ट्रेनिंग दे ती थी कि किस प्रकार से आमदनी को बढ़ाया जाए ,और इस क्षेत्र में मैंने लंबे समय तक कार्य किया था।

डॉ मंजू को अब यह करना था कि वह अपने काम को इस प्रकार से जारी रखें या फिर सामाजिक उधम में उतर जाएं। उन्होंने कहा कि गैर-लाभकारी संगठन से जुड़ते हुए हम एक व्यवसाय नहीं ,

चला सकते परंतु हमें यह आवश्यक पता है कि जंगलों में उत्पादित होने वाली उपज को प्रोडक्ट के रूप में के लिए अगर आदिवासियों को एक प्लेटफार्म दिया जाए तो यह उनकी आमदनी का एक अच्छा स्रोत बन सकता है।

कुछ समय बाद ही डॉक्टर मंजू ने अपनी सहायता के लिए डॉक्टर श्रीजा के साथ मिलकर फॉरेस्ट पोस्ट   ( Forset Post )  की शुरुआत कर दी। और आज यह फॉरेस्ट पोस्ट पर्यावरण को ध्यान में रखकर आदिवासियों द्वारा तैयार किए गए पारंपरिक और प्रमाणिक उत्पादों को तैयार करने के लिए एक प्लेटफार्म दे रहा है।

 

जंगल को बचाना है सबसे पहला मकसद

 

डॉ मंजू कहती है कि हमने प्लेटफार्म तो दे दिया और आदिवासियों द्वारा प्रोडक्ट्स जो तैयार किए जा रहे थे उनका निर्यात भी काफी अधिक हो रहा था परंतु बढ़ती प्रोडक्ट्स कि डिमांड से जंगल संसाधनों का भारी दोहन होने लगा, और यह काफी परेशानी की बात थी और इस कारण हमने इस समस्या का हल करने के लिए जंगल के कई संसाधनों पर सीमा प्रतिबंध लगा दिया कि इतनी ही सीमा तक इसे लिया जा सकता है।

डॉक्टर मंजू कहती है की हम सभी लोगों को इस बात से यह सिखाना चाहते हैं कि आदिवासी लोग जंगल में रहकर भी आमदनी का अच्छा स्रोत प्राप्त कर सकते हैं और बिना जंगलों को नुकसान किए वह अपनी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर रहे हैं।

डॉ मंजू का मानना है कि आज आदिवासी भविष्य आने वाली कई परिस्थितियों में लड़कर जंगल में रहकर अपना रास्ता बना ले रहे हैं और पर्यावरण को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

 

लेखिका : अमरजीत कौर

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