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Saturday, March 6, 2021

दिन में नौकरी और शाम को “एक रुपया क्लिनिक” चलाने वाले शख्स की प्रेरणादायक कहानी

एक मानव के सबसे बुनियादी जरूरत रोटी, कपड़ा और मकान होती है। इसके बाद शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाती है। यह चीजें किसी भी नागरिक का मूल अधिकार होता है। शिक्षा के क्षेत्र में आज काफी लोग काम कर रहे हैं।

लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत ही कम लोग हैं जो लोगों की मदद के लिए सामने आए हैं। साल 2019 में प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो (PIB) में भारत सरकार की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई थी।

जिसमें कहा गया है कि देश के प्रत्येक 1456 लोगों पर मात्र एक डॉक्टर मौजूद है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन का तय मानक 1000 व्यक्ति पर एक डॉक्टर होना चाहिए है।

हमारे देश में ज्यादातर डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाली युवा प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं। आज अधिकांश डॉक्टर प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं।

ऐसे में गरीब और आर्थिक रुप से कमजोर नागरिकों को अच्छी स्वास्थ्य चिकित्सा उपलब्ध नहीं हो पाती है। तो सवाल यह उठता है कि क्या अच्छी चिकित्सा सुविधाओं का अधिकार गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को नहीं है?

इस विषय पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। इसी बीच आज हम एक ऐसे डॉक्टर की कहानी बताने जा रहे हैं जो लोगों के लिए एक मिसाल है और एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं। हम बात कर रहे हैं उड़ीसा के संबलपुर जिले के डॉक्टर शंकर रामचंदानी की।

डॉ शंकर रामचंदानी बुला स्थिति वीर सुरेंद्र साईं इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। अभी हाल में ही उन्होंने “एक रुपया क्लीनिक” की शुरुआत की है। इस क्लीनिक में वह गरीब और जरूरतमंद लोगों का इलाज करते हैं और फीस के रूप में उनसे मात्र ₹1 लेते हैं।

इस तरह मिली प्रेरणा डॉ शंकर रामचंदानी बताते हैं कि उनके माता पिता का सपना था कि उनके बच्चे समाज के लिए कुछ बेहतर करें। उनके पिता एक किराने की दुकान चलाते थे और मुश्किल से अपने बच्चों को पढ़ा लिखा रहे थे।

उनके पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा डॉक्टर बने और गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए कुछ कर सके। वह डॉक्टर बनने के बाद अपने पिता का यह सपना पूरा कर रहे हैं।

डॉक्टर रामचंदानी के दादा विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत आ गए थे और दिन रात मेहनत करके उन्होंने अपने परिवार को दोबारा से बसाया था। डॉ रामचंदानी बताते हैं कि उनके पिता ने बचपन में बहुत संघर्ष किया था।

इसलिए वह हमेशा अपने बच्चों को लोगों की मदद करने की शिक्षा दिया करते थेम उनके पिताजी चाहते थे कि वह गरीबों के लिए मुफ्त में नर्सिंग होम चलाएं लेकिन आज के दौर में मुफ्त में नर्सिंग होम चलाना एक बहुत ही मुश्किल काम है।

क्योंकि कोई भी नर्सिंग होम चलाने के लिए बहुत संसाधन और पैसों की जरूरत होती है। इसलिए उन्होंने एक रुपये क्लीनिक खोला इस तरह से वह अपने पिता के सपने को साकार करने की कोशिश कर रहे हैं।

इस तरह हुई शुरुआत :-

कहा जाता है कि कुछ न करने से बेहतर है कि छोटे ही स्तर पर कुछ किया जाए। डॉ शंकर रामचंदानी सुबह से शाम तक कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर नौकरी करते हैं और शाम को अपने क्लीनिक पर पहुंच जाते हैं।

जहां पर हर दिन हुआ 30 से 35 मरीजों का इलाज करते हैं। ज्यादातर इलाज करने वालों में बुखार, हाइपरटेंशन, डायबिटीज जैसी बीमारियों से पीड़ित लोग रहते हैं।

डॉक्टर रामचंदानी मरीजों से मेडिकल टेस्ट और इलाज के बदले में सिर्फ ₹1 फीस लेते हैं। अगर कोई मरीज इस हालत में नहीं होता है कि वह दवाइयां खरीद सके। तब कई बार वह खुद भी दवाई खरीद कर मरीज को देते हैं।

एक रुपए फीस लेने के पीछे की वजह :-

डॉ शंकर रामचंदानी बताते हैं कि ₹1 लेने के पीछे कुछ वजह है। ₹1 इसलिए लेते हैं क्योंकि वह यह नही चाहते कि लोगों को यह लगे कि वह मुफ्त में इलाज करवा रहे हैं।

लोगों को यह लगे कि वह मुफ्त में इलाज नही करवा रहे हैं बल्कि फीस दे रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपनी फीस ₹1 रखी है। वह आगे बताते हैं कि हर मरीज का हक है कि वह अच्छे से अच्छा इलाज करवा सके।

डॉक्टर रामचंदानी फीस के रूप में ₹1 ले रहे हैं और यह उनकी जिम्मेदारी होती है कि वह अपने मरीजों का सही इलाज करें। फीस कितनी है इससे फर्क नहीं पड़ता है।

यह पहली बार नही हुआ है जब डॉक्टर रामचंदानी के लोगों के लिए इस तरह करने कार्य कर रहे हैं। वह जब से मेडिकल के क्षेत्र से जुड़े हैं तब से लगातार समाज के लिए कुछ न कुछ काम कर रहे हैं।

जब उन्होंने सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर का पद जब ज्वाइन किया था, तब उस समय नियम के हिसाब से वह अपना क्लीनिक नही खोल सकते थे।

लेकिन जब वह असिस्टेंट प्रोफेसर बन गए तब उन्होंने किराए पर एक जगह लेकर वहां पर अपनी क्लीनिक की शुरुआत की। क्लीनिक की शुरुआत करने से पहले भी वह गरीब लोगों का इलाज करते थे और उन्हें आर्थिक मदद भी देते थे।

कुष्ठ रोगियों की सेवा :-

डॉक्टर रामचंदानी पिछले एक साल से कुष्ठ रोग से ग्रसित मरीजों की देखभाल और इलाज कर रहे हैं। बुला के एक सामाजिक कार्यकर्ता उनके बारे में कहते हैं कि डॉक्टर रामचंदानी के मदद से बहुत से कुष्ठ रोगियों को अच्छे अस्पताल में इलाज मिलने लगा है।

यह भी पढ़ें :- पिछले 12 सालों से अब तक 4 लाख लोगों का भर चुके हैं पेट, समर्थ लोगों से खाना लेकर जरूरतमंदों का पेट भरते हैं

वह कुष्ठ के बारे में लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं। इस बीमारी को समाज में छुआछूत की बीमारी के तौर पर जाना जाता है। यही वजह है कि मरीजों को इलाज सही से नहीं मिल पाता और हालत बिगड़ जाती है । लेकिन डॉ शंकर रामचंदानी जैसे डॉक्टर इस तस्वीर को बदलने में जुट गए हैं।

इस तरह होती है फंडिंग :-

एक दुपया क्लीनिक को चलाने के लिए धन आपूर्ति में फिलहाल यह अपनी कमाई का एक हिस्सा लगाते हैं। साथ में उनके परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें सहयोग करते हैं।

दुनिया में और भी काफी अच्छे लोग हैं जिन्हें भी उसके बारे में जानकारी होती है।वह उन्हें आर्थिक मदद पेश करते हैं। लेकिन फिलहाल वह अपने पैसों से ही यह काम कर रहे हैं। किसी भी मरीज को इलाज के लिए पैसे की जरूरत होने पर वह अपनी तरफ से भी मदद करते हैं।

डॉ शंकर रामचंदानी के द्वारा किए जाने वाले इस काम के लोगों द्वारा खूब सराहना हो रही है लेकिन उनका कहना है कि यह तो अभी सिर्फ शुरुआत है। अभी एक लंबा सफर तय करना बाकी है। वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक बेहतर इलाज पहुंचाना चाहते हैं।

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